शराफत के बाज़ार

शराफत के बाज़ार, अब नहीं लगते
जो बचे हैं उनमे सिर्फ फरेब बिकता है
पहली सी सादगी अब नहीं दिखती
नाउम्मीद इंसान सहमा सा दिखता है

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